॥ जय श्रीराम ॥

आरती संग्रह

सात प्रमुख आरतियों का संग्रह — नीचे किसी भी शीर्षक पर जाकर पाठ करें।

गोस्वामी तुलसीदास कृत

श्रीहनुमान चालीसा

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार।बल बुधि विद्या देहु मोहिं हरहु कलेश विकार॥

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥॥१-२॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥॥३-४॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूँज जनेऊ साजै॥संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥॥५-६॥

विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥॥७-८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे॥॥९-१०॥

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥॥११-१२॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥॥१३-१४॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥॥१५-१६॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥॥१७-१८॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥॥१९-२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना॥॥२१-२२॥

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें कांपै॥भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥॥२३-२४॥

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥॥२५-२६॥

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥॥२७-२८॥

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥॥२९-३०॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥॥३१-३२॥

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥॥३३-३४॥

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥॥३५-३६॥

जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥॥३७-३८॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥॥३९-४०॥

पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप।राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

आरती कीजै हनुमान लला की

श्रीहनुमान आरती

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके॥अंजनि पुत्र महाबलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥

दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥

लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे॥लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। लाये संजीवन प्राण उबारे॥

पैठि पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखाड़े॥बायें भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥

सुर नर मुनि जन आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें॥कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई॥

जो हनुमानजी की आरति गावै। बसि बैकुण्ठ परमपद पावै॥

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

आरति श्री रामायण जी की

श्रीरामायणजी की आरती

श्रीमद्रामचरितमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये।ते संसारपतंगघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥

आरति श्री रामायण जी की। कीरति कलित ललित सिय पी की॥गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बाल्मीकि बिग्यान बिसारद॥

सुक सनकादिक सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥गावत बेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस॥

मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस सम्मत सबही की॥गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी॥

ब्यास आदिक कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड़ के ही की॥कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥

दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की॥

ॐ जय शिव ओंकारा

श्रीशिवजी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥

जटा में गंगा बहत है, गल मुण्डन माला।शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोइ नर गावे।कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

ॐ जय जगदीश हरे

श्रीजगदीशजी की आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।स्वामी दुःख विनसे मन का।सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।स्वामी तुम अन्तर्यामी।पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।स्वामी तुम पालन-कर्ता।मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।स्वामी सबके प्राणपति।किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।स्वामी तुम ठाकुर मेरे।अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।स्वमी पाप हरो देवा।श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।स्वामी जो कोई नर गावे।कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥

जय लक्ष्मीरमणा

श्रीसत्यनारायणजी की आरती

जय लक्ष्मीरमणा श्री जय लक्ष्मीरमणा।सत्यनारायण स्वामी जनपातक हरणा॥

रत्नजड़ित सिंहासन अद्भुत छवि राजे।नारद करत निराजन घंटा ध्वनि बाजे॥

प्रगट भये कलि कारण द्विज को दर्श दियो।बूढ़ो ब्राह्मण बनकर कंचन महल कियो॥

दुर्बल भील कठारो इन पर कृपा करी।चन्द्रचूड़ एक राजा जिनकी विपति हरी॥

वैश्य मनोरथ पायो श्रद्धा तज दीनी।सो फल भोग्यो प्रभुजी फिर स्तुति कीनी॥

भाव भक्ति के कारण छिन-छिन रूप धर्यो।श्रद्धा धारण कीनी तिनको काज सर्यो॥

ग्वाल बाल संग राजा वन में भक्ति करी।मनवांछित फल दीनो दीनदयाल हरी॥

चढ़त प्रसाद सवाया कदली फल मेवा।धूप दीप तुलसी से राजी सत्यदेवा॥

श्री सत्यनारायणजी की आरती जो कोई नर गावे।कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥

जय अम्बे गौरी

श्रीअम्बेजी की आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥

माँग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।उज्जवल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥

शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥

ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी।आगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी॥

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरूँ।बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरु॥

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥

भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी।मनवान्छित फल पावत, सेवत नर-नारी॥

कन्चन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥

श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै।कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै॥